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पेड़

मैं पेड़ हूँ निरंतर कटता रहता हूँ, कटते कटते तुम्हारे घर बनाता हूँ जीते जी तुम्हारी सांसो में बस जाता हूँ। तुम जीते हो तो काम आता हूँ, मरते हो तो भी काम आता हूँ, कहीं पे घना जंगल ...

गाँव की छाँव (कविता)

बात कर रहा हूँ गांव की बात की, मैं बात कर रहा हूँ हर गाँव के ज़ज्बात की आज भी बहुत कुछ है मेरे गाँव मे ऐसा, के शरमा जाए शहर की औकात भी।* जब दिल किया तो काम कर लेता हूँ, जब भी चाहा तो आरा...