पेड़


मैं पेड़ हूँ

निरंतर कटता रहता हूँ,

कटते कटते तुम्हारे घर बनाता हूँ

जीते जी तुम्हारी सांसो में बस जाता हूँ।

तुम जीते हो तो काम आता हूँ,

मरते हो तो भी काम आता हूँ,

कहीं पे घना जंगल है मेरा,

कही पर अकेला नजर आता हूं।

मेरे जीवन का तुम्हारे जीवन से गहरा नाता है,

मेरी वजह से तू बड़े बड़े घर बनाता है,

मेरा रोम रोम तुझे सांसे दे जाता है,

हे इंसान ¡ फिर भी मुझे क्यों काटता जाता है,

मेरे बने पलंगों पर चैन से सोता है,

मेरी ही छाया में अपने पसीने को सुखाता है,

जब मेरा तुझसे  इतना गहरा नाता है,

फिर क्यों तू मुझे काटता ही जाता है।

मैं दुनिया मे  बस तेरे लिए ही आता हूँ,

तेरे लिये बारिश और बहार खींच लाता हूँ,

मुझे काटके तेरा मतलब निकल जाता है,

क्यों तू मुझे लगातार काटता ही जाता है।

मेरे अंग अंग तेरे(माफिया के) भंडार में पड़े हैं,

मेरी नस नस को तू रातों-रात बेच देता है,

मेरी नजर में वही इंसान, इंसान रह गया है,

जो मुझे और मेरे जंगल को बचा लेता है।

कभी  तू 5 -5 भाइयों के साथ एक घर मे रहता था,

पर आज अकेले ही 5-5 घर बना रहा है,

अपनी चंद दिनों की शानो-शौकत में ,

क्यों मेरे वजूद को मिट्टी में मिला रहा है।

रातों-रात मुझे छलनी किया जा रहा है,

मुझे बेच के करोडों रुपैया जमा किया जा रहा है,

जो लोग मुझे बचाने की जद्दोजहद में लगे हैं,

उनका सीना उनके धड़ से अलग किया जा रहा है।

चंद होशियारों ने मेरे होशियार को मार डाला,

छीन लिया उसके जीवन का हर निवाला,

एक बात सुन लो अंधेरे के सौदागरों ,

जिस दिन जल उठी मेरे मन की ज्वाला,

उस दिन करके रहूंगा तुम सबका मुंह काला।

                        -संजय ठाकुर ( कवि)

Comments