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Showing posts from November, 2018

गाँव की छाँव (कविता)

बात कर रहा हूँ गांव की बात की, मैं बात कर रहा हूँ हर गाँव के ज़ज्बात की आज भी बहुत कुछ है मेरे गाँव मे ऐसा, के शरमा जाए शहर की औकात भी।* जब दिल किया तो काम कर लेता हूँ, जब भी चाहा तो आरा...