गाँव की छाँव (कविता)
बात कर रहा हूँ गांव की बात की,
मैं बात कर रहा हूँ हर गाँव के ज़ज्बात की
आज भी बहुत कुछ है मेरे गाँव मे ऐसा,
के शरमा जाए शहर की औकात भी।*
जब दिल किया तो काम कर लेता हूँ,
जब भी चाहा तो आराम कर लेता हूँ,
एक दिन भी जब शहर में गुजरता है मेरा,
शहर की भीड़-भाड़ को आखिरी सलाम कह देता हूँ।
सुबह-2 खेत जाता हूँ,खाने को घर लौट आता हूँ,
भरपेट खाना और आराम करके फिर वहीं लौट जाता हूँ
शाम होते चल पड़ता हूँ घर की तरफ मैं,
काम की मौज मस्ती में हर दिन यूँ बिताता हूँ।
भूख भी अच्छी लगती है,नींद भी गजब की आती है,
गॉंव की लहराती फसलें मन को भा जाती हैं,
रम जाता है हर वो शख्स जो गाँव मेरे आता है,
हरे-भरे खेतों की सैर में,शहर की थकान मिटाता है।
आज एक सिलसिला सा चल पड़ा है,
हर कोई शहर को निकल पड़ा है,
सुकून छोड़ के दो वक्त की रोटी कमाने का,
कैसा दस्तूर चल पड़ा है आज ये ज़माने का,
गांव में कोई ऐसा नही जो जिससे हमारा काम नही,
जो काम घर मे हम न जाने ,ऐसा कोई काम नही,
शहर में जाके भी ज़िन्दगी के कुछ साल गुज़ारे थे,
पता चला कि यहाँ पड़ोसी से भी पहचान नहीं।
शहर में कुछ लोग नौकरी की तलाश में जाते हैं,
कुछ बच्चे अच्छी पढ़ाई की आस में जाते हैं,
कैसे कह दूं उनको सुविधा सम्पन्न मैं,
जो आज भी अम्मा से दूध,लस्सी और घी मंगाते हैं।
गॉंव में वो सब मिल जाता है,
जिसके लिए शहरवासी सब्जी की दुकान जाता है,
कैसे कह दूं उसे की वो शहरी अमीर घराने का है,
जो सब्जी के साथ हरि मिर्च-धनिया मुफ्त में लाता है।
गाँव को पिछड़ा कहने वालों,
एक बार यहां आके तो देखो,
मेरे खेतों की मक्की की रोटी,
सरसो के साग का चटकारा लगा लो,
दिल नही करेगा तुम्हारा कभी शहर जाने का,
अपने खेतों में मेहनत से कभी कमाकर तो देख लो।
Sanjay Thakur
संजय ठाकुर
मण्डी हिमाचल प्रदेश
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